हाँ की भीड़ में कहीं खो गया था वजूद मेरा, एक छोटी सी 'न' ने मुझे मेरी पहचान लौटा दी।
अक्सर बचपन में हमें आज्ञाकारी बनने को कहा जाता है जिसके लिए हमें "हॉं" कहने की तालीम भी दी जाती है। क्याेकि समाज में "हॉं" को स्वीकृति और अच्छाई का प्रतीक बताया जाता है और हमें निरंतर यह भी सिखाया जाता है कि जो इंसान हर बात पर "हॉं" कहता है, वह सबका चहेता होता है, लेकिन इसी "हॉं" की इस रट में हम अक्सर अपने भीतर की उस
धीमी आवाज को भी अनसुना कर देते हैं जो "ना" कहना चाहती हैंजिंदगी की इस भागदौड़ और विशालकाय रंगमंच पर जहां हर कोई आपसे आपका वक्त, आपकी भावनाओं का कुछ हिस्सा मांगता है वहीं "ना" महज एक शब्द नहीं होता परंतु एक संपूर्ण वाक्य होता है और सबसे बढ़कर, यह आत्मप्रेम का इजहार होता है
हां का मायाजाल और और अपना वजूद खोती हुई रूह।
अक्सर हम दूसरों को खुश करने की चाहत और खुद की अच्छी छवि बनाने के लिए अपने हसरतो का गला घोंट देते हैं, और तभी शायद इसलिए कहा जाता है कि हर बात पर हां कहना ऐसी बहती नदी के समान होता है जिसका अपना कोई किनारा नहीं होता, वह बस निरंतर बहती जाति है दूसरों के खेतों को सिंचती रहती है लेकिन इस तरह एक दिन वह खुद सूख जाती है।
जब हम हर उस चीज़ को 'हाँ' कहते हैं जो हमारी आत्मा को मंज़ूर नहीं तो कहीं ना कहीं हम खुद को बड़ा धोखा दे रहे होते हैं क्योकि यह एक ऐसा कर्ज के समान होता है जो हम अपने भावनाओं से लेते हैं और जिसका ब्याज हमारी मानसिक शांति को चुकाना पड़ता है।
सबके उम्मीदो का बोझ उठाते उठाते हम भूल जाते हैं कि हमारे भी पंख होते थे एक आजाद परिंदों की तरह उड़ने के लिए
ना एक दीवार नहीं अपितु एक लक्ष्मण रेखा होती है।
काव्यात्मक दृष्टि से देखा जाए तो ना एक दीवार नहीं है जो आपको दुनिया से अलग करती है, परंतु यह एक लक्ष्मण रेखा के समान होती है जो आपके सुकून और आपके आत्मसम्मान की भी रक्षा करती। न वह चौकीदार की तरह होता है जो आपके वजूद की हिफाजत करता है। कुछ इस तरह की यह आपके मन के दरवाजे पर खड़ा रहता है और यह तय करता है कि कौन सा विचार, कौन सा इंसान और कौन सी जिम्मेदारी आपके लायक है या नहीं?
क्योंकि जिंदगी में हमारे साँसें भी सीमित हैं और वक्त भी जब हम किसी के गैर जरूरी काम को न कहते हैं, तो हम अपने सपनों को अपने सुकून को हां कहते हैं, क्योंकि हमारी हर हां हमारे जीवन की ऊर्जा को खर्च करती है और ना उस ऊर्जा को समेट कर हमारे वैयक्तिक विकास के लिए बचाती है।
रिश्तों की कसौटी है न।
हम अक्सर इस डर से भी ना नहीं कहते कि कहीं रिश्ते न टूट जाएँ। कहीं कोई हमसे ना रूठ जाए या हमारी अच्छी छवि ना खराब हो जाए। लेकिन ज़रा गौर करिए कि जो रिश्ता महज आपकी हां की बुनियाद पर ही टिका हो, तो क्या वह सच में रिश्ता है या फिर महज एक मतलब का सौदा है।
मेरे समझ से तो सच्चे रिश्ते कभी कांच की तरह नाजुक नहीं हो सकते की जो एक ना की चोट से बिखर जाए। रिश्ते तो उस मजबूत पेड़ की तरह होते हैं जो हर मौसम की मार को झेलने के बाद भी मजबुती से खड़े रहते हैं। जब आप किसी अपने को ना कहते हैं और जब वह आपकी मजबूरी या आपकी उस काम की क्षमता की सीमा को समझकर मुस्कुरा देता है, तो समझ लीजिए, आपने एक सच्चा साथी पाया है।
ना शब्द रिश्तों में एक तरह का फिल्टर का काम करता है जो आपके जीवन से दिखावटी लोगों को छान कर बाहर कर देता है और सिर्फ उन्हें आने देता है जो आपके वजूद से प्यार करता है ना कि आपके द्वारा उनके लिए किए गए काम को। सच्चे मोहब्बत और सच्चे दोस्त आपके हाथ के मोहताज नहीं होते। वह आपके ना का भी उतना ही सम्मान करते हैं
समाज की बेड़ियाँ और ना की ऊँची और उड़ान।
समाज अक्सर उस इंसान से खौफ खाता है जिसने न कहना को हुनर सीख लिया हो। क्योंकि ना कहने वाला इंसान हमेशा आज़ाद रहता है, वह किसी की कठपुतली बन कर नहीं रहता और जब वो इनसान समाज के उन खोखली रीतियों को न कहता है जो उसको अनियमित बंधन में बांधे रहती है, जब वो उन झुठी उम्मीदों को ना कहता है, जो उसको उसके असली रूप से दूर ले जाती है तब वो बगावत नहीं कर रहा होता। वो बस अपने होने का जश्न मना रहा होता हैं।
न कहना भी एक कला की तरह होता है जिसे गुस्से में नहीं बल्कि एक शांत भरी भावना के साथ आँखों में आँखें डालकर एक शांत मुस्कान के साथ कहा जाता है। इसमें करवाहट की नहीं बल्कि ढीढ़ता की आवश्यकता होती है
ना कहने का साहसी तरीके।
ना कहने के लिए भी जीवन में साहस का होना भी बहुत जरूरी है पर इसे कैसे कहा जाए, इसके लिए कुछ काव्यात्मक और व्यावहारिक कदम उठाए जा सकते हैं, जैसे कि:
- खुद से पहले पूछें: दूसरों को जवाब देने से पहले कुछ पल आप ठहरीए। अपने अन्दर झाँकींए और अपने दिल की बात सुनींए की क्या आपका दिल इस काम के लिए राज़ी है जो आपसे कहा जा रहा है करने के लिए यदि आपके भीतर से आवाज ना की आय तो उसे होठों तक भी आने दिजीए, उसे रोकें नहीं।
- पछतावे की चादर को उतार कर फेंकें: ना कहने के बाद हल्का सा हमें एक पछतावा तो होता है या दुख भी होता है परंतु उसे आप मेहमान की तरह ही आने दें और उसी तरह ही उसे जाने दें। उसे अपने घर का मालिक बनने न दें, क्योंकि जब आप इस पछतावे में जी रहे होते हैं कि आपने उस व्यक्ती या काम को न क्यों कह दिया तो कहीं न कहीं वह पछतावा आपके मन में एक घर बनाकर बैठ जाता है और धीरे धीरे वह आपकी शांति को भी अपने अंदर जकड़ लेता है और आपका मन अशांत हो जाता है, जिस कारण से आपका पूरा जीवन भी अथल में बह सकता है।
- शब्दों का श्रृंगार के साथ ना कहना: ना को कहने के लिए किसी रूखेपन या करवाहटपन की जरूरत नहीं होती। आप इसे कुछ इस तरह से भी सम्मानजनक तौर पर कह सकते हैं, "मैं आपकी कद्र करता हूँ, लेकिन अभी मेरे कुछ जरुरी काम हेै जिसे करना मेरे लिए महत्वपूर्ण है और जिसके लिए मैं आपको अभी वक्त नहीं दे सकता"
इतिहास के पन्नो से।
ना शब्द में इतनी शक्ती होती जिसने अमरीका जैसे देश को अपना कनून बदलने पर मजबुर कर दिया था। अमेरिका के मोंटगोमरी, अलबामा में बसों में एक नियम था कि अश्वेत लोगों को गोरे लोगों के लिए अपनी सीट छोड़नी पड़ती थी। लेकिन 1 दिसंबर 1955 को रोज़ा पार्क्स नाम की एक महिला बस में सवार हुईं और एक गोरे व्यक्ति ने उनसे सीट छोड़ने को कहा। लेकिन उस समय, रोज़ा पार्क्स ने उन्हें अपनी सीट देने से इनकार कर दिया।
नतीजतन, बस ड्राइवर ने उन्हें गिरफ़्तार करवा दिया और इसके बाद होल्ट स्ट्रीट बैपटिस्ट चर्च में बहुत से लोग इकट्ठा हुए और बस का बहिष्कार जारी रखने पर सहमत हुए। इस बहिष्कार का बहुत असर हुआ क्योंकि बस कंपनी के लगभग 75% यात्री अश्वेत थे। बाद में, 13 नवंबर 1956 को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुनाते हुए यह कानून पास किया कि नस्लवाद ग़ैर-कानूनी है।
अंत में।
जिंदगी के खाली कैनवस पर सिर्फ हर रंग हाँ का नहीं हो सकता। अगर तस्वीर में सिर्फ उजाला ही उजाला होगा तो आकृतियाँ कभी उभर कर नहीं आ सकतीं। तस्वीर में थोड़े से बारीकियां देने के लिए आप को ना रूपी काली सिहाई की भी उतनी ही जरूरत पड़ती है। याद रखिए जिंदगी में हर ना में कहीं-न-कहीं किसी और चीज के लिए हाँ, छुपी हुई होती है जैसे,
- जब आप रविवार के दिन अपने काम को अपने ऑफिस को न कहते हैं, तो आप अपने परिवार के साथ बिताए हुए सुकून से जीने के लिए हां कहते हैं।
- जब आप किसी जहर जैसे रिश्ते को न कहते हैं, तो आप अपनी मानसिक शांति को भी हां कहते हैं
- जब आप दूसरों के अंधी दौड़ को ना कहते हैं, तब आप अपनी खुद की मंजिल को भी हां कहते हैं
इसलिए इस छोटे से शब्द ना से घबराएँ नहीं बल्कि इसे अपनाएं। इसे अपनी ढाल की तरह प्रयोग करें, क्योंकि जिस दिन आप बिना डरे बिना झिझके ना कहना सीख जाएंगे उस दिन आप सही मायने में अपनी जिंदगी को एक मुकम्मल हां कह पाएंगे।
न कहकर मैंने अपनी जमीन बचा ली व नाहा के तूफानों में मेरा आसमान भी छिन जाता।
इस तरह और आर्टिकल पढ़ने के लिए कृप्या यहा जांए
No comments:
Post a Comment